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ज्योतिष में मंगल

मुख्य विषय: कर्म, इच्छा, क्रोध, साहस, प्रतिस्पर्धा, सीमा

स्वराशि
मेष (शास्त्रीय और वैदिक ज्योतिष में वृश्चिक भी)
पूरा चक्र
लगभग 2 वर्ष (हर राशि में लगभग 6 हफ़्ते)
वक्री
हर 2 साल में एक बार, लगभग ढाई महीने

उच्च, नीच और कमज़ोर राशि: मकर में उच्च का होता है, कर्क में नीच का; तुला और वृषभ में स्वराशि के ठीक सामने होने से कमज़ोर रहता है (डिट्रिमेंट)।

मंगल चाहने से करने तक का क़दम बताता है। किसी चीज़ की इच्छा करना शुक्र का काम है, तो उसके लिए आगे बढ़ना मंगल का।

यह क्रोध और टकराव का भी सूचक है: ग़ुस्सा आने पर व्यक्ति क्या करता है, अपनी सीमा की रक्षा कैसे करता है, उसके लिए आपत्ति जताना आसान है या कठिन। जिन कुंडलियों में मंगल पीड़ित होता है, वहाँ क्रोध आमतौर पर ग़ायब नहीं होता, बस अपनी जगह बदल लेता है।

शास्त्रीय ज्योतिष में मंगल को "छोटा अशुभ ग्रह" (इन्फ़ोर्टूना माइनर) माना जाता है। आधुनिक पाठ में इसे नकारात्मकता नहीं, क़ीमत के रूप में समझा जाता है: मंगल जहाँ होता है, वहाँ प्रगति होती है, पर बिना घर्षण के नहीं।

मंगल हर दो साल में एक बार वक्री होता है, और इस दौर को ऐसे समय के रूप में पढ़ा जाता है जब बाहर की ओर बढ़ने वाली पहल पीछे हटती है और भीतर जमा ग़ुस्सा सतह पर आता है।

कुंडली में भाव

स्थित भाव: वह क्षेत्र जहाँ ऊर्जा, संघर्ष और पहल केंद्रित होते हैं।

अन्य ग्रह

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