मुख्य विषय: पहचान, इच्छाशक्ति, जीवन-शक्ति, सचेत स्व
- स्वराशि
- सिंह
- पूरा चक्र
- 1 वर्ष (हर राशि में लगभग 30 दिन)
- वक्री
- कभी वक्री नहीं होता
उच्च, नीच और कमज़ोर राशि: मेष में उच्च का होता है, तुला में नीच का; कुंभ में स्वराशि के ठीक सामने होने से कमज़ोर रहता है (डिट्रिमेंट)।
सूर्य कुंडली का केंद्र नहीं, उसका केंद्रीय प्रश्न है: यह व्यक्ति किस दिशा में बढ़ रहा है? शास्त्रीय ग्रंथों में यह जीवन-शक्ति, प्राणशक्ति और पिता का कारक है; आधुनिक ज्योतिष में पहचान और सचेत इच्छा की दिशा का।
सूर्य राशि यह नहीं बताती कि व्यक्ति क्या है, बल्कि यह कि वह किस ओर विकसित हो रहा है। यह अंतर महत्वपूर्ण है, क्योंकि लोग अक्सर कहते हैं कि वे अपनी सूर्य राशि में ख़ुद को नहीं पहचानते। सूर्य कोई आरंभ-बिंदु नहीं, दिशा का सूचक है।
कुंडली में सूर्य जिस भाव में होता है, वह जीवन का वह क्षेत्र दिखाता है जहाँ व्यक्ति सबसे अधिक दिखाई देता है और अपनी ऊर्जा सबसे सहज ढंग से खर्च करता है। सूर्य के साथ बनने वाले कोणीय संबंध (योग) तय करते हैं कि यह अभिव्यक्ति कितनी सहजता से बहती है।
कुंडली में भाव
स्थित भाव: जीवन के किस क्षेत्र में व्यक्ति दिखाई देता है और सक्रिय रहता है।