- भाव का प्रकार
- केंद्र
- स्वाभाविक राशि / स्वामी
- मेष / मंगल
मुख्य विषय: शरीर, रूप-रंग, पहली छाप, दुनिया से मिलने का ढंग, जीवन की शुरुआत
पहला भाव उस बिंदु से शुरू होता है जो आपके जन्म के क्षण पूर्वी क्षितिज पर उदित हो रहा था; इसे लग्न (असेंडेंट) कहते हैं। यह कुंडली का आरंभ-बिंदु है और सभी भावों का क्रम यहीं से बनता है।
यह भाव पहचान नहीं, आपका बाहरी आवरण बताता है: दुनिया को आपका कौन-सा रूप दिखता है, किसी कमरे में आपके आते ही लोग सबसे पहले क्या देखते हैं, और किसी नई स्थिति में आपकी पहली सहज प्रतिक्रिया क्या होती है। सूर्य बताता है कि आप कौन हैं, लग्न बताता है कि लोग आपको किस रूप में ग्रहण करते हैं।
इस भाव का स्वामी, यानी लग्नेश, पूरी कुंडली का प्रतिनिधित्व करता है। लग्नेश जहाँ बैठा है, जीवन का गुरुत्व-केंद्र वहीं है। कुंडली पढ़ते समय यह दूसरी देखने वाली बात है; पहली बात है सूर्य, चंद्रमा और लग्न की तिकड़ी।
भाव खाली हो तो
यहाँ ग्रह हो या न हो, इससे ज़्यादा फ़र्क़ नहीं पड़ता; पहला भाव खाली हो, तब भी लग्नेश को हमेशा पढ़ा जाता है।
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