- भाव का प्रकार
- केंद्र
- स्वाभाविक राशि / स्वामी
- तुला / शुक्र
मुख्य विषय: विवाह, साझेदार, खुले प्रतिद्वंद्वी, अनुबंध, आमने-सामने का रिश्ता
सातवाँ भाव लग्न के ठीक सामने है, और ठीक इसी कारण यह "दूसरे" का भाव है। जिस किसी से भी व्यक्ति आमने-सामने होता है, वह यहीं है: जीवनसाथी, व्यापारिक साझेदार, वकील, सलाहकार, और खुलकर विरोध करने वाला प्रतिद्वंद्वी।
शास्त्रीय ज्योतिष में यह विवाह का भाव है। आधुनिक पाठ में यह "हर वह रिश्ता जो आमने-सामने और बराबरी पर बनता है" तक फैल जाता है। साझा बात यह है कि रिश्ता परस्पर हो और स्पष्ट रूप से परिभाषित हो।
लग्न के साथ इसका अक्ष महत्वपूर्ण है: पहला भाव बताता है कि व्यक्ति अकेले कैसा व्यवहार करता है, सातवाँ बताता है कि किसी के आमने-सामने आने पर क्या होता है। दोनों अक्सर एक-दूसरे को पूरा करते हैं।
भाव खाली हो तो
खाली हो तो इसके स्वामी और शुक्र को साथ पढ़ा जाता है। खाली सातवें भाव का अर्थ यह नहीं कि विवाह नहीं होगा।
अन्य भाव
- पहला भाव · स्वयं और बाहरी रूप
- दूसरा भाव · धन और मूल्य
- तीसरा भाव · बुद्धि और निकट परिवेश
- चौथा भाव · जड़ें और घर
- पाँचवाँ भाव · सृजन और आनंद
- छठा भाव · काम और दिनचर्या
- आठवाँ भाव · साझा संसाधन और रूपांतरण
- नौवाँ भाव · अर्थ और दूर का संसार
- दसवाँ भाव · करियर और सार्वजनिक छवि
- ग्यारहवाँ भाव · समुदाय और भविष्य
- बारहवाँ भाव · एकांत और अवचेतन